फ़लक पर जवां थी सितारों की महफ़िल
थी रोशन बहुत चाँद तारों की महफ़िल,
के मस्ती मे थे, टिमटिमाते थे सारे
अंधेरे मे हों नूर के जैसे धारे,
क़मर भी अजब आब ओ ताब मे था
तलातुम सा एक जैसे सीमाब मे था,
उरूसे शबे गुल्सितां चाँदनी थी
के नस नस मे शब की रवां चाँदनी थी,
के नूरे इलाही अता हो रहा था
जवां शब का फिर हौसला हो रहा था।
ग़रज़ हर तरफ़ रोशनी रोशनी थी
मगर चश्मे शब मे निहाँ नीस्ती थी,
ख़बर जब फ़ना की फ़ज़ाओं मे फैली
सितारों की ग़म से हुई आँख मैली,
ये सुन के क़बा चाक गुलशन ने करदी
दुआओं से फिर झोली शबनम ने भरदी,
सितारों के झुरमुट मे हलचल हुई फिर
के महफ़िल सितारों की ओझल हुई फिर,
घमंड चाँद तारों का पल भर मे टूटा
बक़ा की तमन्ना ने दोनों को लूटा।
के नूरे सुबहा ख़ून बन बन के दौड़ा
तिलिस्मे शबे दार मशरिक़ ने तोड़ा।
अज़हर क़मर
very nice lines bhai..
ReplyDeleteکیا ہی خوب منظر کشی کی ہے۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ زبردست
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