Saturday, April 11, 2015

तिलिस्मे शबे दार मशरिक़ ने तोड़ा

फ़लक पर जवां थी सितारों की महफ़िल 
थी रोशन बहुत चाँद तारों की महफ़िल,
के मस्ती मे थे, टिमटिमाते थे सारे 
अंधेरे मे हों नूर के जैसे धारे,
क़मर भी अजब आब ओ ताब मे था 
तलातुम सा एक जैसे सीमाब मे था,
उरूसे शबे गुल्सितां चाँदनी थी 
के नस नस मे शब की रवां चाँदनी थी,
के नूरे इलाही अता हो रहा था 
जवां शब का फिर हौसला हो रहा था।
ग़रज़ हर तरफ़ रोशनी रोशनी थी 
मगर चश्मे शब मे निहाँ नीस्ती थी,
ख़बर जब फ़ना की फ़ज़ाओं मे फैली
सितारों की ग़म से हुई आँख मैली,
ये सुन के क़बा चाक गुलशन ने करदी 
दुआओं से फिर झोली शबनम ने भरदी,
सितारों के झुरमुट मे हलचल हुई फिर
के महफ़िल सितारों की ओझल हुई फिर,
घमंड चाँद तारों का पल भर मे टूटा 
बक़ा की तमन्ना ने दोनों को लूटा।
के नूरे सुबहा ख़ून बन बन के दौड़ा 
तिलिस्मे शबे दार मशरिक़ ने तोड़ा।
अज़हर क़मर

2 comments:

  1. کیا ہی خوب منظر کشی کی ہے۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ زبردست

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