उठाकर गिराया, गिराकर उठाया
ये सर कितने दर पर है तुमने झुकाया,
इबादत के क़ाबिल फ़क़त एक खुदा है
ज़रा सा ये जुमला समझ मे ना आया,
ख़ुदा है वही बस,वही एक ख़ुदा है
उसी ने है मारा उसी ने जिलाया,
हुवेदा हुआ नूरे हक़ जिस घड़ी फिर
सबक़ सूरह इक़रा का उसने पढ़ाया,
के कुरआं दिया और सुन्नत अता की
हमे दीने हक़ पर यूं चलना सिखाया,
जुदा हक़ को बातिल से उसने किया फिर
खरा और खोटा अलग कर दिखाया,
उसी रास्ते पर है बस कामरानी
मुहम्मद ने जिस रास्ते पर चलाया।
अज़हर क़मर
ये सर कितने दर पर है तुमने झुकाया,
इबादत के क़ाबिल फ़क़त एक खुदा है
ज़रा सा ये जुमला समझ मे ना आया,
ख़ुदा है वही बस,वही एक ख़ुदा है
उसी ने है मारा उसी ने जिलाया,
हुवेदा हुआ नूरे हक़ जिस घड़ी फिर
सबक़ सूरह इक़रा का उसने पढ़ाया,
के कुरआं दिया और सुन्नत अता की
हमे दीने हक़ पर यूं चलना सिखाया,
जुदा हक़ को बातिल से उसने किया फिर
खरा और खोटा अलग कर दिखाया,
उसी रास्ते पर है बस कामरानी
मुहम्मद ने जिस रास्ते पर चलाया।
अज़हर क़मर
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