ज़मीं ज़ेर थी जिससे कोनो मकां की
थी जिसका मुकद्दर खिलाफ़त जहां की,
लरज़ते थे सहरा ओ दरिया भी जिससे
मिली थी इमामत ज़मीं आसमां की,
हक़ीक़त से अपनी वो अब बे ख़बर है
ख़बर कुछ मकां की न ही लमकां की,
के है राज़ मखफ़ी तेरे ही जिगर मे
कभी तो सदा सुन दिले बेकरां की,
मुहम्मद के गुलशन की तू एक कली है
तेरे दम से रौनक़ है इस गुल्सितां की,
के अब हौश मे आ मसीहा-ए-आलम
मिटा दे खुदाई तू अहले बुतां की,
तड़प कर सदा आई अर्शे बरीं से
सुबहा शाम जब मैंने आहों फुगां की।
कहा दिल ने मेरे ये एक रोज़ मुझसे
रविश पर न जाना तू अहले जहां की।
अज़हर क़मर
थी जिसका मुकद्दर खिलाफ़त जहां की,
लरज़ते थे सहरा ओ दरिया भी जिससे
मिली थी इमामत ज़मीं आसमां की,
हक़ीक़त से अपनी वो अब बे ख़बर है
ख़बर कुछ मकां की न ही लमकां की,
के है राज़ मखफ़ी तेरे ही जिगर मे
कभी तो सदा सुन दिले बेकरां की,
मुहम्मद के गुलशन की तू एक कली है
तेरे दम से रौनक़ है इस गुल्सितां की,
के अब हौश मे आ मसीहा-ए-आलम
मिटा दे खुदाई तू अहले बुतां की,
तड़प कर सदा आई अर्शे बरीं से
सुबहा शाम जब मैंने आहों फुगां की।
कहा दिल ने मेरे ये एक रोज़ मुझसे
रविश पर न जाना तू अहले जहां की।
अज़हर क़मर