Sunday, April 12, 2015

बिरादरान-ए-इस्लाम के नाम ..

ज़मीं ज़ेर थी जिससे कोनो मकां की
थी जिसका मुकद्दर खिलाफ़त जहां की,
लरज़ते थे सहरा ओ दरिया भी जिससे
मिली थी इमामत ज़मीं आसमां की,
हक़ीक़त से अपनी वो अब बे ख़बर है
ख़बर कुछ मकां की न ही लमकां की,
के है राज़ मखफ़ी तेरे ही जिगर मे
कभी तो सदा सुन दिले बेकरां की,
मुहम्मद के गुलशन की तू एक कली है
तेरे दम से रौनक़ है इस गुल्सितां की,
के अब हौश मे आ मसीहा-ए-आलम
मिटा दे खुदाई तू अहले बुतां की,
तड़प कर सदा आई अर्शे बरीं से
सुबहा शाम जब मैंने आहों फुगां की।
कहा दिल ने मेरे ये एक रोज़ मुझसे
रविश पर न जाना तू अहले जहां की।
अज़हर क़मर

मुहम्मद ने जिस रास्ते पर चलाया।

उठाकर गिराया, गिराकर उठाया
ये सर कितने दर पर है तुमने झुकाया,

इबादत के क़ाबिल फ़क़त एक खुदा है
ज़रा सा ये जुमला समझ मे ना आया,

ख़ुदा है वही बस,वही एक ख़ुदा है
उसी ने है मारा उसी ने जिलाया,

हुवेदा हुआ नूरे हक़ जिस घड़ी फिर
सबक़ सूरह इक़रा का उसने पढ़ाया,

के कुरआं दिया और सुन्नत अता की
हमे दीने हक़ पर यूं चलना सिखाया,

जुदा हक़ को बातिल से उसने किया फिर
खरा और खोटा अलग कर दिखाया,

उसी रास्ते पर है बस कामरानी
मुहम्मद ने जिस रास्ते पर चलाया।

अज़हर क़मर

Saturday, April 11, 2015

तिलिस्मे शबे दार मशरिक़ ने तोड़ा

फ़लक पर जवां थी सितारों की महफ़िल 
थी रोशन बहुत चाँद तारों की महफ़िल,
के मस्ती मे थे, टिमटिमाते थे सारे 
अंधेरे मे हों नूर के जैसे धारे,
क़मर भी अजब आब ओ ताब मे था 
तलातुम सा एक जैसे सीमाब मे था,
उरूसे शबे गुल्सितां चाँदनी थी 
के नस नस मे शब की रवां चाँदनी थी,
के नूरे इलाही अता हो रहा था 
जवां शब का फिर हौसला हो रहा था।
ग़रज़ हर तरफ़ रोशनी रोशनी थी 
मगर चश्मे शब मे निहाँ नीस्ती थी,
ख़बर जब फ़ना की फ़ज़ाओं मे फैली
सितारों की ग़म से हुई आँख मैली,
ये सुन के क़बा चाक गुलशन ने करदी 
दुआओं से फिर झोली शबनम ने भरदी,
सितारों के झुरमुट मे हलचल हुई फिर
के महफ़िल सितारों की ओझल हुई फिर,
घमंड चाँद तारों का पल भर मे टूटा 
बक़ा की तमन्ना ने दोनों को लूटा।
के नूरे सुबहा ख़ून बन बन के दौड़ा 
तिलिस्मे शबे दार मशरिक़ ने तोड़ा।
अज़हर क़मर